लेखनी कहानी -18-Nov-2022

                    आर्केस्टा गर्ल का दर्द

*****************************************************

तेज वाल्यूम और शोर शराबे के पीछे एक छोटी बच्ची की रोती चीख सुनाई है

आज मेरी तस्वीर अखबार में बदनाम आर्केस्टा वाली लड़की के टैग के रूप में छपी दिखाई है

अब तो लोगो के गंदे गंदे कमेंट सुनने की आदत हो गई है साहब।

अब तो वहशी लोगो के हाथ से वदन छू जाने की आदत हो गई है साहब

अब तो आदत हो गई है रात में शर्दी में तकिए के बीच अकेले खामोश रोने की साहब

अब तो आदत हो गई अपनी इज्जत सरे आम महफिल में खुद लूट जानें की साहब

बाबू जी छोटे छोटे कपड़े पहनना हमे अच्छा नहीं लगता है साहब

लेकिन क्या करू मुझे आर्केस्टा संचालक से भी डर लगता है  साहब

उघडे वदन तन दिखाने को जी नहीं करता है साहब

हमे भी सुरक्षित घर में महफूज रहने को बहुत मन करता है साहब

अब तो आदत हो गई है रोने की अब तो आदत है तन्हाई में करवट बदलने की साहब

यहां दबंग लोग आर्केस्टा चलाते है साहब 

हम गरीब ना कुछ कह पाते है साहब

सजी मादक भरी महफिल तालियो और सीटियों का छोर होता है साहब

नृत्य और संगीत के पीछे सिसकती बिलखती बच्चियों का शोर होता हैं  साहब

मंच पर आकर्षक मेकअप अधूरे कपड़े पहन थिरकती बच्चियों के अंतर्मन आँसू समाज नही देखता है साहब

पिता समान पुरुष और युवा लूटते है बच्चियों का इज्जत साहब

बच्चियों के रोने या चीखने से कभी वो आहत नही होते है साहब

चेहरे पे ये मुस्कान करती बच्चियां रोज अपनी जिंदगी तबाह करती है साहब

मंच पे पर्दे के पीछे समाज में वर्षो खूब ये रोती है। साहब

बेबसी के शिकार हम किशोरियों और युवतियों को कौन समझ पाया है साहब

जिसने बस देखा हमारे जिस्म के उघड़े वदन और खूबसूरती ही देख पाया है साहब

गरीबी की मार झेल रही हम बच्चीयों को आज कौन समझ पाया है साहब

हमने ने आज परिवार को चलाने हेतु खुद का आवरू लूटते पाया है  साहब

जिस परिवार के लिए हमने खुद को तबाह किया है आज उस परिवार ने हमे देख मुंह बिचकाया है  साहब

माता पिता के इलाज और घर के तंग हाल से हमने अपना जिंदगी नरक बनाया है साहब

अपनी आँसुओ को मुस्कान के पीछे दर्द छुपा कैसे मैं यहां नृत्य करती हूंँ साहब

समाज और दुष्कृत्य लोगो के सामने मैं खामोश हो मादक नृत्य पेश करती हूंँ साहब

इतनी कोमल दिल की मैं बाला ना जाने कैसे लोगो की अश्लील हरकत सह पाती हूंँ साहब

कम कपड़े और मादक अदाओं से मंच पे हमे नृत्य करना अच्छा नहीं लगता है साहब

जब ऐसे नृत्य ना करूं तो संचालक हमे डपटने लगता है साहब 

हम नतरकीयो के नृत्य का सभी आनंद उठाते है  साहब

जब भी पास या छूने का अवसर मिले तो ये छूने से नही कतराते है साहब

वहशी नजर से हरदम ये यहां वहां हाथ लगाते है साहब

लेकिन समाज हमारे जिंदगी को संवारने का प्रयत्न नही करता है साहब

देता है तो बस हमे आर्केस्टा गर्ल के नाम का टैग देता है साहब

वहशी नजर से हमे देखते रहते है ये साहब

ये गलत कमेंट और फब्तियां कसते रहते है साहब

सिटी बजाने व अश्लील हरकत करने से गुरेज नहीं करते है साहब

समाज में हमे इज्जत ना सम्मान दिया जाता है।साहब

दिया जाता तो हमे तो बस दरिंदो के सामने परोस दिया जाता है  साहब

आर्केस्टा संचालक गरीब दुबली कुचली हम लड़कियों को फसाते है साहब

कम उम्र सुन्दर काया का जम के फायदा उठाते है साहब

गरीब होने के कारण मेरा आर्थिक और शारीरिक शोषण भी खूब करते रहते है साहब

आर्केस्टा संचालक हमे डरा धमका कर अपने अंगुली पे नचाते है  साहब

हर समय हर वक्त हमे पीटते रहते फायदा उठाते है साहब

आदत हो गई सब सहने की खुद रोने और चुप रहने की साहब

आदत हो गई घुट घुट दर्द यातना सहते रहने की साहब

भाई की पढ़ाई और मांँ का दवा मंगाना है साहब

अगले महीने फिर से घर का किराया भिजवाना है  साहब

पापा के अस्थमा का इलाज हमे करवाना है साहब

अब तो ये तेज वाल्यूम में थिरकना अब आदत हो गई हैं साहब

भाई के स्कूल के लिए अगले महीने फीस भिजवाना है साहब

इस नरक जिंदगी से अपनी छोटी बहन को उबारो साहब।

***************************************************

राजेश बनारसी बाबू

उत्तर प्रदेश वाराणसी

8081488312

स्वरचित एवं अप्रकाशित  रचना 



   12
6 Comments

Mahendra Bhatt

19-Nov-2022 06:18 PM

शानदार प्रस्तुति 👌

Reply

धन्यबाद जी

Reply

धन्यबाद आदरणीय

Reply

बहुत ही सुन्दर

Reply

धन्यबाद आदरणीय

Reply